The Second Chance Book मृत्यु की पराजय

भूमिका जब पापी अजामिल मृत्युशय्या पर लेटा था तो उसने तीन भयानक मानव जैसे प्राणियों को अपने मरणासन्न शरीर से उसके प्राण निकालकर उसे दण्ड देने के लिए यमराज के धाम ले जाने के लिए अपनी ओर आते देखा। आश्चर्य तो यह था कि अजामिल इस भयावह विपदा से बच गया। किन्तु कैसे ? इसे आप इस पुस्तक मृत्यु की पराजय- एक मरणासन्न व्यक्ति की कहानी के पृष्ठों में पाएंगे। इसके अतिरिक्त आप आत्मा तथा वास्तविकता (सत्य) के विषय में अनेक महत्त्वपूर्ण बातें जानेंगे जिससे आप मृत्यु से अपनी अनिवार्य मुठभेड़ का सामना करने तथा मरने के लिए अच्छी तरह तैयार रहें। आज भी लोग मृत्यु के बहुत निकट पहुँचकर अजामिल जैसी मुठभेड़ की सूचना देते हैं, जिससे इस बात को बल मिलता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है। १९८२ में जार्ज गैलप जूनियर ने ऐडवेंचर्स इन इम्पोर्टेलिटी (अमरता विषयक साहसिक कथाएँ) प्रकाशित की, जिसमें मृत्यु के तथा मरते समय और शरीर त्यागने के बाद के अनुभवों सम्बन्धी अमेरिकी विश्वासों के सर्वेक्षण के परिणामों का वर्णन है। सर्वेक्षण में सम्मिलित किये गए व्यक्तियों में से ६७ प्रतिशत लोगों ने बतलाया कि वे मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास करते हैं; १५ प्रतिशत लोगों ने यह कहा कि उन्हें स्वयं मृत्यु के निकट के कुछ अनुभव हुए हैं। जिन लोगों ने मृत्यु के निकट के अनुभवों की सूचना दी उनसे उन अनुभवों का वर्णन करने को कहा गया। इनमें से ९ प्रतिशत लोगों ने शरीर से बाह्य अनुभूति की सूचना दी, जबकि ८ प्रतिशत ने बतलाया कि मृत्यु के निकट उन्हें एक या अधिक विशिष्ट प्राणी दिखे। गैलप का यह सर्वेक्षण पहेली जैसा है, किन्तु यह मूल प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि क्या ऐसे मरणासन्न अनुभव का-विशेषकर शरीर त्यागने के बाद का -कोई वैज्ञानिक प्रमाण है मृत्यु की पराजय मरणासन्न लोगों के अध्ययन से, जो प्रायः बेहोशी में होते हैं, लगता है कि ऐसा प्रमाण है। इन लोगों ने अपने पार्थिव शरीर की बाहरी दृष्टिकोण से सम्बन्धित घटनाओं की ठीक-ठीक रिपोर्ट दी है। हृदय-आघात के रोगियों दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों तथा युद्धभूमि में घायल सिपाहियों ने ऐसे अनुभव की सूचना दी है। एमोरी विश्वविद्यालय के मेडिकल स्कूल के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. माइकल बी. सैबोभ ने अपनी पुस्तक रिकलेक्शन्स ऑफ डेथ ए मेडिकल इनवेस्टिगेशन (१९८२) में यह स्पष्ट लिखा है कि मन दया मस्तिष्क की पृथक्-पृथक् सत्ता है और मृत्यु के निकट अल्प काल के लिए मन तथा मस्तिष्क पृथक् हो जाते हैं। इस प्रश्न के विभिन्न पक्ष की सम्यक खोजबीन मृत्यु की पराजय नामक पुस्तक में श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने की हैं, जो अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के संस्थापक आचार्य हैं। हजारों वर्ष पूर्व भारत में अजामिल की कथा तथा मृत्यु के निकट उसके अनुभव को महान आचार्य श्रील शुकदेव गोस्वामी ने अपने शिष्य राजा परीक्षित से बतलाया। उनकी वातां श्रीमद्भागवतम् के षष्ठम् स्कन्ध में अंकित है। १९७५-७६ में श्रीमद्भागवतम् का अंग्रेजी अनुवाद करते समय श्रील प्रभुपाद ने अजामिल की कथा का अनुवाद किया। उन्होंने मूलपाठ के साथ हर श्लोक की उद्दीपक टीका भी कर दी। किन्तु श्रील प्रभुपाद ने अजामिल की कथा पहली बार नहीं बतलाई। १९७०-७१ की शीत ऋतु में श्रील प्रभुपाद अपने पाश्चात्य शिष्यों के साथ भारत में भ्रमण कर रहे थे। इन शिष्यों ने कई बार उन्हें अजामिल की कथा कहते सुना था और उन्हों के अनुरोध पर उन्होंने अजामिल कथा पर शृंखलावद्ध व्याख्यान दिये। इस तरह मृत्यु की पराजय में श्रीमद्भागवतम् के षष्ठम् स्कन्ध की टीका तथा १९७०-७१ में भारत भ्रमण के समय दिये गए व्याख्यानों के कुछ उद्धरणों को संकलित किया गया है। अजामिल की कथा नाटकीय, शक्तिशाली तथा मन बहलाने वाली है। अजामिल के द्वारा मृत्युदूतों का सामना करने तथा मोक्ष प्राप्त करने के समय जो आध्यात्मिक तथा आत्मविषयक वाद-विवाद चलता है, वह जीवन के गहनतम प्रश्नों के विषय में रुचि उत्पन्न करने वाला है। मनुष्यों तथा पशुओं में अन्तर मनुष्यों तथा पशुओं में अन्तर श्रील शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित से कहा : कान्यकुब्ज ( वर्तमान भारत का कन्नौज) नामक नगर में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसने एक वेश्या दासी से अपना विवाह कर लिया और निम्न जाति की इस स्त्री की संगति के फलस्वरूप उसने अपने सारे ब्राह्मण गुण गँवा दिये। अजामिल दूसरे लोगों को बन्दी बनाकर, उन्हें जुए में ठगकर या उन्हें सीधे लूटकर कष्ट देता था। इस तरह से वह अपनी पत्नी तथा अपने बच्चों का पालन-पोषण करता था। ( श्रीमद्भागवतम् ६.१.२१-२२) कर्मफलों के नियम यद्यपि अजामिल का जन्म ब्राह्मण पिता से हुआ था और वह विधि-विधानों का कड़ाई से पालन करता था-न मांस खाता था, न अवैध यौन में रत होता था, न नशा करता था, न ही जुआ खेलता था- किन्तु वह एक वेश्या से प्रेम करने लगा, अतएव उसके सारे सद्गुण जाते रहे। जब कोई पुरुष विधि विधानों को त्याग देता है, तो वह नाना प्रकार के पापकर्मों में लग जाता है। विधि-विधान हमें मानव जीवन के आदर्श स्तर पर बनाए रखते हैं। किन्तु यदि हम उन्हें त्याग देते हैं, तो हम मोहमय जीवन में-माया में जा गिरते हैं। यदि हम आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहते हैं, तो हमें विधि विधानों का पालन करना चाहिए और अपने विगत जीवनों तथा इस वर्तमान जीवन की त्रुटियों को सुधारना चाहिए। जो लोग सभी प्रकार के पापकर्मों मुक्त हो चुके हैं और अब पुण्यकर्मों में लगे हुए हैं, वे ही ईश्वर को पूरी से. तरह से समझ सकते हैं। जो पापकर्म करते हैं और शारीरिक सुविधाओं एवं लौकिक मैत्री, समाज तथा पारिवारिक स्नेह के प्रति अत्यधिक अनुरक्त रहते हैं, उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति नहीं हो पाती। है। मनुष्य को प्रामाणिक गुरु के समीप जाकर विनयपूर्वक जिज्ञासा करनी चाहिए। परम सत्य (परब्रह्म) की व्याख्या शास्त्रों में पाई जाती है और इन शास्त्रों की व्याख्या गुरु या सन्तपुरुष द्वारा की जाती है। प्रामाणिक एवं स्वरूपसिद्ध गुरु जो भी कहें उसे स्वीकार करना चाहिए। यहाँ शास्त्रों की व्याख्या करने की गुंजाइश नहीं है। श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसी तरह उठा लिया जिस तरह कोई बालक कुकुरमुत्ते को उठा लेता है। उन्होंने इतनी आसानी से इसे सम्पन्न किया, किन्तु लोग इसपर विश्वास नहीं करते। जो लोग श्रीमद्भागवतम् में विश्वास नहीं करते वे परोक्ष अर्थ ग्रहण करते हैं। अर्थ स्पष्ट रहता है

BG 1.1 Hindi

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥ धृतराष्ट्र ने कहा- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? तात्पर्य : भगवद्गीता एक बहुपठित आस्तिक विज्ञान है जो गीता-माहात्म्य में सार रूप में दिया हुआ है। इसमें यह उल्लेख है कि मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण के भक्त की सहायता से संवीक्षण करते हुए भगवद्गीता का अध्ययन करे और स्वार्थप्रेरित व्याख्याओं के बिना उसे समझने का प्रयास करे। अर्जुन ने जिस प्रकार से साक्षात् भगवान् कृष्ण से गीता सुनी और उसका उपदेश ग्रहण किया, इस प्रकार की स्पष्ट अनुभूति का उदाहरण भगवद्गीता में ही है। यदि उसी गुरु-परम्परा से, निजी स्वार्थ से प्रेरित हुए बिना, किसी को भगवद्गीता समझने का सौभाग्य प्राप्त हो तो वह समस्त वैदिक ज्ञान तथा विश्व के समस्त शास्त्रों के अध्ययन को पीछे छोड़ देता है। पाठक को भगवद्गीता में न केवल अन्य शास्त्रों की सारी बातें मिलेंगी अपितु ऐसी बातें भी मिलेंगी जो अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं हैं। यही गीता का विशिष्ट मानदण्ड है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा साक्षात् उच्चरित होने के कारण य पूर्ण आस्तिक विज्ञान है। महाभारत में वर्णित धृतराष्ट्र तथा संजय की वार्ताएँ इस महान दर्शन के मूल सिद्धान्त का कार्य करती हैं। माना जाता है कि इस दर्शन की प्रस्तुति कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में हुई जो वैदिक युग से पवित्र तीर्थस्थल रहा है। इसका प्रवचन भगवान् मानव जाति के पथ-प्रदर्शन तब किया गया जब इस लोक स्वयं धर्मक्षेत्र शब्द सार्थक क्योंकि कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन के पक्ष श्रीभगवान् स्वयं उपस्थित कौरवों पिता धृतराष्ट्र अपने पुत्रों विजय को सम्भावना विषय में अत्यधिक संदिग्ध था। अतः सन्देह के कारण उसने सचिव पूछा, “उन्होंने क्या किया ?” वह आश्वस्त कि पुत्र तथा छोटे भाई पाण्डु के पुत्र की युद्धभूमि में निर्णयात्मक संग्राम लिए एकत्र हुए फिर भी उसकी जिज्ञासा सार्थक है। नहीं चाहता कि भाइयों कोई समझौता हो, वह युद्धभूमि में अपने पुत्रों की नियति (भाग्य, भावी) विषय में आश्वस्त चाह रहा था। चूँकि युद्ध को कुरुक्षेत्र लड़ा जाना जिसका उल्लेख में के निवासियों के लिए तीर्थस्थल के रूप में हुआ है अतः धृतराष्ट्र अत्यन्त भयभीत कि पवित्र स्थल का के परिणाम न जाने कैसा प्रभाव पड़े। उसे भलीभांति ज्ञात कि इसका प्रभाव अर्जुन तथा पाण्डु अन्य पुत्रों पर अत्यन्त अनुकूल पड़ेगा क्योंकि स्वभाव से सभी पुण्यात्मा संजय व्यास का शिष्य अतः उनकी कृपा संजय धृतराष्ट्र के कक्ष में बैठे-बैठे कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल दर्शन युद्धस्थल की स्थिति विषय पूछा। पाण्डव तथा धृतराष्ट्र के दोनों एक वंश से सम्बन्धित किन्तु यहाँ धृतराष्ट्र के वाक्य से उसके मनोभाव प्रकट होते उसने जान-बूझ अपने पुत्रों को कहा और पाण्डु पुत्रों वंश के उत्तराधिकार bhagavad gita iskcon hindi bg 1.5 hindi bg 1.5 hindi bg 1.4 hindi bhagavad gita as it is in hindi The Second Chance Book मृत्यु की पराजय भूमिका जब पापी अजामिल मृत्युशय्या पर लेटा था तो उसने तीन भयानक मानव जैसे प्राणियों को अपने मरणासन्न शरीर से Read more bhagavad gita chapter 1 TEXT 1: Dhṛtarāṣṭra said: O Sañjaya, after my sons and the sons of Pāṇḍu assembled in the place of pilgrimage Read more Eligibility of Going back Home, back to Godhead Going back Home, back to God is confirmed if you follow the five principles mentioned in the four essential verses Read more Lakshmi, the Goddess of fortune Lakshmi, the Goddess of fortune, is the constant companion of Lord Vishnu; they remain together constantly. One cannot keep Lakshmi Read more The revealed scripture The revealed scriptures, like Manu-samhitha and similar others, are considered the standard books to be followed by human society. Thus, Read more

bhagavad gita chapter 1

TEXT 1: Dhṛtarāṣṭra said: O Sañjaya, after my sons and the sons of Pāṇḍu assembled in the place of pilgrimage at Kurukṣetra, desiring to fight, what did they do? TEXT 2: Sañjaya said: O King, after looking over the army arranged in military formation by the sons of Pāṇḍu, King Duryodhana went to his teacher and spoke the following words. TEXT 3: O my teacher, behold the great army of the sons of Pāṇḍu, so expertly arranged by your intelligent disciple the son of Drupada. TEXT 4: Here in this army are many heroic bowmen equal in fighting to Bhīma and Arjuna: great fighters like Yuyudhāna, Virāṭa and Drupada. TEXT 5: There are also great heroic, powerful fighters like Dhṛṣṭaketu, Cekitāna, Kāśirāja, Purujit, Kuntibhoja and Śaibya. TEXT 6: There are the mighty Yudhāmanyu, the very powerful Uttamaujā, the son of Subhadrā and the sons of Draupadī. All these warriors are great chariot fighters. TEXT 7: But for your information, O best of the brāhmaṇas, let me tell you about the captains who are especially qualified to lead my military force. TEXT 8: There are personalities like you, Bhīṣma, Karṇa, Kṛpa, Aśvatthāmā, Vikarṇa and the son of Somadatta called Bhūriśravā, who are always victorious in battle. TEXT 9: There are many other heroes who are prepared to lay down their lives for my sake. All of them are well equipped with different kinds of weapons, and all are experienced in military science. TEXT 10: Our strength is immeasurable, and we are perfectly protected by Grandfather Bhīṣma, whereas the strength of the Pāṇḍavas, carefully protected by Bhīma, is limited. TEXT 11: All of you must now give full support to Grandfather Bhīṣma, as you stand at your respective strategic points of entrance into the phalanx of the army. TEXT 12: Then Bhīṣma, the great valiant grandsire of the Kuru dynasty, the grandfather of the fighters, blew his conchshell very loudly, making a sound like the roar of a lion, giving Duryodhana joy. TEXT 13: After that, the conchshells, drums, bugles, trumpets and horns were all suddenly sounded, and the combined sound was tumultuous. TEXT 14: On the other side, both Lord Kṛṣṇa and Arjuna, stationed on a great chariot drawn by white horses, sounded their transcendental conchshells. TEXT 15: Lord Kṛṣṇa blew His conchshell, called Pāñcajanya; Arjuna blew his, the Devadatta; and Bhīma, the voracious eater and performer of herculean tasks, blew his terrific conchshell, called Pauṇḍra. TEXTS 16-18: King Yudhiṣṭhira, the son of Kuntī, blew his conchshell, the Ananta-vijaya, and Nakula and Sahadeva blew the Sughoṣa and Maṇipuṣpaka. That great archer the King of Kāśī, the great fighter Śikhaṇḍī, Dhṛṣṭadyumna, Virāṭa, the unconquerable Sātyaki, Drupada, the sons of Draupadī, and others, O King, such as the mighty-armed son of Subhadrā, all blew their respective conchshells. TEXT 19: The blowing of these different conchshells became uproarious. Vibrating both in the sky and on the earth, it shattered the hearts of the sons of Dhṛtarāṣṭra. TEXT 20: At that time Arjuna, the son of Pāṇḍu, seated in the chariot bearing the flag marked with Hanumān, took up his bow and prepared to shoot his arrows. O King, after looking at the sons of Dhṛtarāṣṭra drawn in military array, Arjuna then spoke to Lord Kṛṣṇa these words. TEXTS 21-22: Arjuna said: O infallible one, please draw my chariot between the two armies so that I may see those present here, who desire to fight, and with whom I must contend in this great trial of arms. TEXT 23: Let me see those who have come here to fight, wishing to please the evil-minded son of Dhṛtarāṣṭra. TEXT 24: Sañjaya said: O descendant of Bharata, having thus been addressed by Arjuna, Lord Kṛṣṇa drew up the fine chariot in the midst of the armies of both parties. TEXT 25: In the presence of Bhīṣma, Droṇa and all the other chieftains of the world, the Lord said, “Just behold, Pārtha, all the Kurus assembled here.” TEXT 26: There Arjuna could see, within the midst of the armies of both parties, his fathers, grandfathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons, friends, and also his fathers-in-law and well-wishers. TEXT 27: When the son of Kuntī, Arjuna, saw all these different grades of friends and relatives, he became overwhelmed with compassion and spoke thus. TEXT 28: Arjuna said: My dear Kṛṣṇa, seeing my friends and relatives present before me in such a fighting spirit, I feel the limbs of my body quivering and my mouth drying up. TEXT 29: My whole body is trembling, my hair is standing on end, my bow Gāṇḍīva is slipping from my hand, and my skin is burning. TEXT 30: I am now unable to stand here any longer. I am forgetting myself, and my mind is reeling. I see only causes of misfortune, O Kṛṣṇa, killer of the Keśī demon. TEXT 31: I do not see how any good can come from killing my own kinsmen in this battle, nor can I, my dear Kṛṣṇa, desire any subsequent victory, kingdom or happiness. TEXTS 32-35: O Govinda, of what avail to us are a kingdom, happiness or even life itself when all those for whom we may desire them are now arrayed on this battlefield? O Madhusūdana, when teachers, fathers, sons, grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law and other relatives are ready to give up their lives and properties and are standing before me, why should I wish to kill them, even though they might otherwise kill me? O maintainer of all living entities, I am not prepared to fight with them even in exchange for the three worlds, let alone this earth. What pleasure will we derive from killing the sons of Dhṛtarāṣṭra? TEXT 36: Sin will overcome us if we slay such aggressors. Therefore it is not proper for us to kill the sons of Dhṛtarāṣṭra and our friends. What should we gain, O Kṛṣṇa, husband of the goddess of fortune, and how could we be happy by killing our own kinsmen?

Eligibility of Going back Home, back to Godhead

Going back Home, back to God is confirmed if you follow the five principles mentioned in the four essential verses of the Bhagavad Gita. Connecting everything to God ahaṁ sarvasya prabhavomattaḥ sarvaṁ pravartateiti matvā bhajante māṁbudhā bhāva-samanvitāḥ  I am the source of all spiritual and material worlds. Everything emanates from Me. The wise who perfectly know this engage in My devotional service and worship Me with all their hearts. (BG10.8) Everything proceeds from God and finally enters in God. Since all belongs to God, everything must be seen in connection to Him. This is the first and preliminary qualification of going back home, back to Godhead. Reading Scriptures in the Association of Devotees mac-cittā mad-gata-prāṇābodhayantaḥparasparamkathayantaś ca māṁ nityaṁtuṣyanti ca ramanti ca The thoughts of My pure devotees dwell in Me, their lives are fully devoted to My service, and they derive great satisfaction and bliss from always enlightening one another and conversing about Me. (BG10.9) It is one thing to know that everything is connected to God and it is quite another thing to know ‘How’ everything is connected to God. Only by reading the scriptures, in the association of devotees, can one begin to see what is the unique connection of each and everything in the world to God.  For example, Krishna in the Bhagavad Gita says I am the taste of water, or I am the heat and light of fire, or I am the cheating of the cheat, or I am the piety of the pious etc. Everything has a unique connection with God and it needs a scrutinizing study of the scriptures to know and understand that connection. Thus reading scriptures is the second qualification to go back home, back to Godhead. Doing Relentless Service teṣāṁ satata-yuktānāṁbhajatāṁ prīti-pūrvakam To those who are constantly devoted to serving Me with love,(BG10.10) On properly understanding the unique relationship of everything in this world to God a devotee feels his/her duty to serve God.   Besides an obligation, a devotee feels a deep indebtedness for providing and maintaining the world just so that living entities can live peacefully and thus wish to serve one’s Lord relentlessly. Thus relentless service forms the third qualification to go back home, back to Godhead. Preaching dadāmi buddhi-yogaṁ taṁyena mām upayānti te I give the understanding by which they can come to Me.(BG10.10) To those who serve God relentlessly, He awards intelligence to serve Him. The devotee in turn empties one’s heart and teaches others how to serve God just as God inspired him/her. Preaching is therefore a natural consequence of a pure heart which wishes to share with everyone the graces it has received from God. Risking life for God teṣāmevānukampārthamaham ajñāna-jaṁ tamaḥnāśayāmy ātma-bhāva-sthojñāna-dīpenabhāsvatā To show them special mercy, I, dwelling in their hearts, destroy with the shining lamp of knowledge the darkness born of ignorance.(BG 10.11) To those who preach, God personally takes care of them by eradicating the ignorance and doubts in the philosophy and the deep rooted attachments to oneself so that they can help others in a much better way and preach effectively and risk their very lives for God, without any fear, and thus become rightfully qualified to go back home, back to Godhead.  The Second Chance Book मृत्यु की पराजय भूमिका जब पापी अजामिल मृत्युशय्या पर लेटा था तो उसने तीन भयानक मानव जैसे प्राणियों को अपने मरणासन्न शरीर से Read more BG 1.1 Hindi कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥ धृतराष्ट्र ने कहा- Read more bhagavad gita chapter 1 TEXT 1: Dhṛtarāṣṭra said: O Sañjaya, after my sons and the sons of Pāṇḍu assembled in the place of pilgrimage Read more Lakshmi, the Goddess of fortune Lakshmi, the Goddess of fortune, is the constant companion of Lord Vishnu; they remain together constantly. One cannot keep Lakshmi Read more The revealed scripture The revealed scriptures, like Manu-samhitha and similar others, are considered the standard books to be followed by human society. Thus, Read more

Lakshmi, the Goddess of fortune

Lakshmi, the Goddess of fortune, is the constant companion of Lord Vishnu; they remain together constantly. One cannot keep Lakshmi in one’s home without Lord Vishnu. To think that one can do so is very dangerous. To keep Lakshmi, or the riches of the Lord, without the service of the Lord is always dangerous, for then Lakshmi becomes the illusory energy. With Lord Vishnu, however, Lakshmi is the spiritual energy. The Second Chance Book मृत्यु की पराजय भूमिका जब पापी अजामिल मृत्युशय्या पर लेटा था तो उसने तीन भयानक मानव जैसे प्राणियों को अपने मरणासन्न शरीर से Read more BG 1.1 Hindi कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥ धृतराष्ट्र ने कहा- Read more bhagavad gita chapter 1 TEXT 1: Dhṛtarāṣṭra said: O Sañjaya, after my sons and the sons of Pāṇḍu assembled in the place of pilgrimage Read more Eligibility of Going back Home, back to Godhead Going back Home, back to God is confirmed if you follow the five principles mentioned in the four essential verses Read more The revealed scripture The revealed scriptures, like Manu-samhitha and similar others, are considered the standard books to be followed by human society. Thus, Read more

The revealed scripture

The revealed scriptures, like Manu-samhitha and similar others, are considered the standard books to be followed by human society. Thus, the leader’s teaching should be based on the principles of such standard saastras. One who desires to improve himself must follow the standard rules as they are practiced by great teachers. The Second Chance Book मृत्यु की पराजय भूमिका जब पापी अजामिल मृत्युशय्या पर लेटा था तो उसने तीन भयानक मानव जैसे प्राणियों को अपने मरणासन्न शरीर से Read more BG 1.1 Hindi कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥ धृतराष्ट्र ने कहा- Read more bhagavad gita chapter 1 TEXT 1: Dhṛtarāṣṭra said: O Sañjaya, after my sons and the sons of Pāṇḍu assembled in the place of pilgrimage Read more Eligibility of Going back Home, back to Godhead Going back Home, back to God is confirmed if you follow the five principles mentioned in the four essential verses Read more Lakshmi, the Goddess of fortune Lakshmi, the Goddess of fortune, is the constant companion of Lord Vishnu; they remain together constantly. One cannot keep Lakshmi Read more